ये है एक छोटा सा देश, लेकिन अंतर‍िक्ष में देता है महाशक्‍त‍ियों को सीधी चुनौती, अपने काम में सबको करता है हैरान

Best Country in Space Sector:आपको पता ही होगा कि कुछ समय पहले हमारे देश का Chandrayaan 3 कामयाबी हो गया था और इससे भारत स्‍पेस रिसर्च दुनिया की सबसे अग्रणी पंक्‍त‍ि वाले देशों में खड़ा हो गया है. लेकिन एक है ऐसा छोटा सा देश, जो अंतर‍िक्ष के क्षेत्र में दे रहा है महाशक्‍त‍ियों को चुनौती. इतना ही नहीं भारत भी लेता है इसकी मदद.

 

Haryana Update: मानवता एक बार फिर चांद पर जाने के लिए उत्साहित है, क्योंकि Chandrayaan-3 की सफल उड़ान हुई है। कई देशों, जिसमें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA भी शामिल है, ने नए अंतरिक्ष मिशन की घोषणा की है।

बहुत सी कंपनियां मंगल ग्रह पर लोगों को बसाने का भी विचार कर चुकी हैं। आप सही नहीं हैं अगर आप सोच रहे होंगे कि सभी कंपनियां अमेरिका-रूस की होंगी। यूरोप के छोटे से मुल् क लक्ज़मबर्ग में आप इनमें से कई कंपनियों से मिल जाएंगे।

एक मुल् क जो वर्षों से महाशक् त ियों को चुनौती दे रहा है। स् पेस के लिए विशेष कानून बनाए गए हैं। आर्थिक सहायता दी जाती है। यही कारण है कि स् पेस एजेंसियां पूरी दुनिया से इस मुल् क में आकर काम कर रही हैं। यह देश भारत को भी अंतरिक्ष में मदद कर रहा है।

लक्ज़मबर्ग में बहुत सी विदेशी कम्पनियां हैं। यहां काम करने वाली कंपनियों को चांद की खदानों से दुर्लभ खनिज निकालने का भी लक्ष्य है, जैसा कि बीबीसी ने बताया. वे सिर्फ चांद पर लोगों को बसाने तक सीमित नहीं हैं।

ISpace जैसी कंपनियों ने भी वहां अपनी संपत्ति लगाने की योजना बनाई है। कुछ दिनों पहले, कंपनी के सीईओ ताकेशी हाकामाडा ने कहा कि हम चांद से सामान ढोकर लाने की अपनी क्षमता जल्द ही दुनिया को दिखाएंगे।
 

बहुत सी कंपन‍ियां है रजिस्‍टर्ड

आप जानकर हैरान होंगे कि लक्ज़मबर्ग की आबादी महज 6.4 लाख है. लेकिन यहां स्‍पेस में काम करने वाली 10 से ज्‍यादा कंपन‍ियां रजिस्‍टर्ड हैं. यह अंतरिक्ष में खनन के क्षेत्र में कारोबार करने की कोशिश कर रही हैं.

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आख‍िर ऐसा कैसे हुआ? तो बता दें कि लक्ज़मबर्ग दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिसके पास स्पेस रिसोर्स लॉ यानी खगोलीय संसाधन कानून है. यह अमेरिका के बाद दूसरा देश है जो अंतर‍िक्ष में संसाधनों की खोज को कानूनी तौर पर सही मानता है.

सरकार ने 20 करोड़ यूरो का एक फंड बनाया है, जिसके जर‍िए स्पेस रिसर्च का काम कर रही कंपनियों को मदद दी जाती है. पैसे की कमी नहीं आने दी जाती. अंतरिक्ष में कारोबार करने वाली कंपनियों को काफी टैक्स छूट भी दी जाती है.

अमेरिकी भी चाहता है इसकी मदद

अमेरिका की भी कई कंपन‍ियां यहां अपना मुख्‍यालय बना रही हैं. डीप स्पेस इंडस्ट्रीज (डीएसआई) और प्लैनेटरी रिसोर्सेज पहले ही इसका ऐलान कर चुकी है. सरकार ispace नाम की एक जापानी कंपनी और Blue Horizon नाम की एक जर्मन कंपनी के साथ भी काम कर रही है.

इन कंपनियों का मकसद सिर्फ चांद पर खनन नहीं, बल्‍क‍ि चांद और धरती के बीच चक्‍कर लगा रहे उल्‍कापिंडों में दुर्लभ खनिज की तलाश भी करनी है. नवंबर 2020 में भारत ने भी लक्जमबर्ग (Luxembourg)के साथ साइंस और स्‍पेस क्षेत्र में विशेष करार किया.

कुछ दिनों पहले भारतीय अंतर‍िक्ष एजेंसी इसरो ने लक्‍जमबर्ग के चार सेटेलाइट्स लॉन्च किए थे. भारत और लक्ज़मबर्ग के बीच सैटेलाइट प्रसारण और संचार के क्षेत्र में एक सतत अंतरिक्ष सहयोग है.

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