INSPIRATIONS : 4 साल का बच्चा जिसे अनाथालय छोड़ा गया, आज दुनिया को सिखाता है मार्शल आर्ट...
मां की कब और कैसे मौत हुई नहीं पता, उनकी शक्ल भी याद नहीं। बस इतना याद है कि बचपन में एक औरत साथ रहती थी, अचानक कहीं चली गई। 3 साल के बच्चे को इससे ज्यादा क्या समझ होगी। बाद में पता चला कि वो औरत मेरी मां थी।
Haryana Update: मैं सुनील सिंह, पूर्वी नेपाल के कैलाली जिले का रहने वाला हूं। बचपन में पैरेंट्स के साथ मुंबई आ गया। पापा एक नामी कंपनी में सिक्योरिटी मैनेजर थे। कंपनी की तरफ से उन्हें बढ़िया फ्लैट मिला था। सबकुछ था अपने पास। आलीशान जिंदगी थी, लेकिन फिर वक्त ऐसा रूठा कि सबकुछ बदल गया।
तीन साल का था तब मां की मौत हो गई। उसके बाद पापा डिप्रेशन में चले गए। मुझे बोर्डिंग स्कूल में दाखिला कराने के नाम पर अनाथालय में छोड़ गए। कई रात भूखे सोना पड़ा, स्लम एरिया में रहा, मजदूरी की। आज दुनियाभर में मार्शल आर्ट सिखाता हूं।अब अपनी कहानी पर लौटता हूं।
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मां की कब और कैसे मौत हुई नहीं पता, उनकी शक्ल भी याद नहीं। बस इतना याद है कि बचपन में एक औरत साथ रहती थी, अचानक कहीं चली गई। 3 साल के बच्चे को इससे ज्यादा क्या समझ होगी। बाद में पता चला कि वो औरत मेरी मां थी।
मां के जाने के बाद पापा ने नौकरी छोड़ दी। दिनभर घर में मन मारकर बैठ रहते थे। किसी से बातचीत नहीं करते थे। यहां तक कि मेरा भी ख्याल नहीं रख पा रहे थे। एक दिन पड़ोस की आंटी ने पापा से कहा कि सुनील को अनाथालय भेज दीजिए। कम से कम वहां इसकी देखभाल तो हो जाएगी।
पापा ने आंटी की बात मान ली और सेंट कैथरीन नाम के अनाथालय में मुझे एडमिशन दिलवा दिए। तब मैं चार साल का हो चुका था। पापा ने कहा कि यह एक बोर्डिंग स्कूल है और आज से तुझे यहीं रहना है। बहुत मजा आएगा। मैं तुमसे मिलने भी आता रहूंगा।
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कई दिनों तक मैंने पापा का इंतजार किया कि वे अब मिलने आएंगे, लेकिन वे नहीं आए। फिर मैं वहां के माहौल में रच-बस गया।
बड़ा सा खेल का मैदान, खाने के लिए ढेरों स्नैक्स, एक से एक खुशबूदार पकवान, बढ़िया कपड़े, कहीं म्यूजिक चल रहा, तो कहीं कार्टून देखने को मिल रहा है। बेहतरीन बेड, सुंदर सा स्कूल बैग, नई यूनिफॉर्म, किताबें। टीचर्स बहुत प्यार भी करती थीं।
मुझे याद है इटली से आई मैडम हमें अंग्रेजी सिखाया करती थीं। संडे के दिन लोग हमारे लिए लाजवाब पकवान लेकर आते थे। अमेरिका, जर्मनी, पेरिस से लोग एक से बढ़कर एक कपड़े लेकर आते थे। एक अलग ही जिंदगी थी उस अनाथालय में।
कभी-कभी वहां मेरा झगड़ा हो जाता था। जैसे कोई लाइन तोड़कर मेरे आगे खड़ा हो गया। मैं मार-पीट कर देता था। इसलिए थोड़ा बदनाम था वहां।
संडे के दिन पेरेंट्स मीटिंग हुआ करती थी। सभी के मां या पापा या रिश्तेदार बच्चों से मिलने के लिए आया करते थे। वे लोग अपने बच्चों के लिए घर से बना खाना लाते थे।
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मुझे बहुत अजीब लगता था कि मुझसे मिलने के लिए कोई क्यों नहीं आता है। पापा कभी भी मुझसे मिलने के लिए नहीं आए। उनके एक दोस्त थे, पापा ने उनकी यहां नौकरी दिलवाई थी, वे एक-दो बार मुझसे मिलने आए।
मैं उनसे पूछता था कि पापा नहीं आए? उनके पास कोई जवाब नहीं होता। मुझे बहुत खराब लगता था, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता था। कई बार मुझे पापा की बहुत जरूरत होती थी, लेकिन उन्हें शायद इससे फर्क नहीं पड़ता था।
धीरे-धीरे मैं भी उनसे कटता गया। मैं समझ गया था कि मेरी मां है नहीं और पापा को मुझसे मतलब नहीं। मुझे यहां अच्छा लगे या न लगे, कोई और ऑप्शन नहीं था।
पढ़ना-लिखना, डांस, योग, कराटे, खेल कूद, टीवी और खूब सारा खाना। पता ही नहीं चलता था कि यह अनाथालय है। तब वहां एक नियम था कि क्लास में जो बच्चा टॉप करेगा, उसे घुमाने के लिए बाहर ले जाया जाएगा। मैंने बाहर घूमने के लिए खूब पढ़ाई की और क्लास में सेकेंड आया। काफी खुश हुआ कि बाहर घूमने को मिलेगा।
इसके बाद हम जुहू बीच गए। अनाथालय वाले उन बच्चों को भी घूमाने ले गए जो फेल हुए थे। मुझे बहुत गुस्सा आया। उस दिन से मैंने मेहनत करनी बंद कर दी। फिर कभी फर्स्ट या सेकेंड नहीं आया। इस तरह दिन गुजरते गए। जब 8 साल का हुआ, तो खेल पर फोकस करने लगा। एथिलीट बनने का सपना देखने लगा।
मेरे स्पॉन्सर एक दादा जी थे। वो गुजराती थे। मेरे लिए आमरस, खाखरा, बूंदी, थेपला, श्रीखंड लेकर आते थे। देने से पहले बोलते थे कि सीता राम बोलो। मैं चिल्ला-चिल्ला कर प्रार्थना बोलता था, ताकि मुझे जल्द खाने को मिले।
धीरे-धीरे मैं मैच्योर होने लगा। अनाथालय में बोले जाने वाले शब्दों को समझना शुरू किया। उस अनाथालय का नाम था सेंट कैथरीन ऑफ सिएना स्कूल फॉर डेस्टीटयूड चिल्ड्रन। पहली बार मुझे इस अनाथालय का नाम समझ में आया कि यह उन बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता या दोनों में से कोई एक नहीं है।
जब भी स्पॉन्सर खाने का सामान या कपड़े लेकर आते, तो हम गेट पर भाग कर जाया करते थे। बस थैंक्यू, थैंक्यू, थैंक्यू कहते जुबान नहीं थकती थी। ज्यादातर लोग जो सामान लेकर आते थे, वे रूखे से चेहरे से भौंहे चढ़ाकर सामान देते थे। मानो हमें भीख दे रहे हों। यह सब देखकर मुझे अब अपने ऊपर बहुत ही ज्यादा शर्म आने लगी। खुद से नफरत होने लगी।
अब मैं बहुत शरारती, मस्ती करने वाले लड़के से गंभीर लड़का बन चुका था। तब 14 साल का हो चुका था और पांचवी क्लास में था। अपनी हाइट से भी परेशान था। बाकी बच्चों की तुलना में मेरी हाइट ज्यादा थी। मैंने तय किया कि अब सीधे 10वीं करुंगा और ओपन स्कूल से फॉर्म भर दिया, लेकिन अनाथालय प्रशासन इसके खिलाफ था।
उनका कहना था मैं छठी, सातवीं, आठवीं सब क्लास करूं। मैं नहीं माना। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर अनाथालय के नियम नहीं मानते हो तो यहां रहना मुमकिन नहीं है। मुझे गुस्सा आया और अनाथालय छोड़कर बांद्रा बैंड स्टैंड के पीछ वाली झोपड़पट्टी में चला गया। वहां 200 रुपए महीने पर किराए की झोपड़ी मिलती थी। दरअसल अनाथालय में दिन में पढ़ने वाले भी कई बच्चे आते थे। उन्हीं ने मुझे यहां के बारे में बताया था।
उस झोंपड़ी की छत अखबार की थी। बारिश में छत ही उड़ जाती थी पूरा पानी भर जाता था। एक दिन मेरे सापने सांप आ गया। मैंने देखा कि सांप ने मुंह में चूहा भर रखा है। उसे देखकर मेरी जान सूख गई। नहाने के लिए मोहल्ले के नल पर जाना पड़ता था।
एक दिन मराठी आंटी पर कुछ पानी गिर गया। उसने गालियां देनी शुरू कर दी। इतने में वहां बहुत सारे लोग इक्टठा हो गए, उनमें से एक ने मुझे जोर से चांटा मारा। मैं खड़ा रहा और मौका देखकर उस आदमी को जोर से पंच मारकर भाग गया।
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तकरीबन एक हफ्ते तक वापस नहीं गया। इस बीच पापा को पता लग चुका था कि मैं अनाथालय छोड़ चुका हूं। वे मुझसे मिलने आए, लेकिन उन्हें देखकर मुझे खुशी नहीं हुई। हम ऐसे मिले जैसे दो आम लोग मिलते हैं। दो दिन वे साथ रहे, मुझे अपने साथ चलने के लिए कहा, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया।
मैंने इतना जरूर कहा कि मुझे ओपन स्कूल से दसवीं करनी है, मेरी फीस भर दो। पापा ने मेरी फीस भर दी।
उस झोंपड़ी में पढ़ाई नहीं हो सकती थी। मैं वापस अनाथालय गया और वहां उन लोगों से मिन्नतें करने लगा कि मुझे लाइब्रेरी में पढ़ने की परमिशन दी जाए। वे लोग राजी हो गए। अब सवाल था खाना कहां खाऊं। सुबह का खाना किसी दोस्त के यहां खा लेता था। अपने दोस्तों के घर खाने के वक्त पर ही जाता था।
दिन के वक्त चुपके से अनाथालय में खाना खा लेता था। वे लोग जानते थे कि मैं खाना खा रहा हूं, लेकिन कुछ नहीं कहते थे। रात के वक्त तो कई-कई हफ्ते मुझे खाना नहीं मिला। सिर्फ कांदा खाकर ही सोया हूं। जिस झोपड़ी में रहता था, वहां बिजली नहीं थी। चोरी-छिपे इधर-उधर से कनेक्शन जोड़ लेता था। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि अनाथालय छोड़कर मैंने गलती कर दी।
झोपड़ी का किराया देने के लिए मैंने दूध डिलिवरी का काम शुरू किया। सुबह तीन बजे उठकर घर-घर दूध देने जाता था। इससे महीने के 1500 रुपए मिल जाते थे। इस तरह एक साल बीत गया और मेरी दसवीं हो गई। मुझे लगा था कि पास नहीं हो पाऊंगा, लेकिन पास हो गया।
आगे क्या करूं, समझ नहीं आ रहा था। मुझे हमेशा लगता था कि अनाथालय वापस जाना चाहिए। मैं वापस वहां गया। काफी रिक्वेस्ट की तो वे लोग मुझे रखने के लिए राजी हो गए। उन लोगों ने मुझसे लिखित में लिया कि मैं क्यों यहां रहना चाहता हूं।
मैंने लिखित में दिया कि यहां जैसा खाना कहीं नहीं मिलता, सोने के लिए बेहतरीन बेड हैं और नहाने के लिए सुंदर बाथरूम है। इस तरह मैं वापस अनाथालय आ गया। वहां मार्शल आर्ट सीखना शुरू कर दिया था।
एक बहुत बड़ी सेलिब्रेटी हमारे अनाथालय की स्पॉन्सर थीं। उन्होंने अनाथालय प्रशासन से कहा कि बच्चों को कजूएरा (ब्राजील का मार्शल आर्ट, जो वहां का राष्ट्रीय खेल भी है।) सिखाना चाहिए। इसके बाद एक विदेशी कोच को इसके लिए हायर किया गया। मैं वहां सबसे लंबा था, तो टीचर ने कहा कि तुम सबसे आगे रहोगे और लीड करोगे। बस यहीं से मेरी जिंदगी का दूसरा हिस्सा शुरू हुआ।
मुझे कजूएरा करने में मजा आने लगा। यह एक नॉन वाएलेंस मार्शल आर्ट है। इसमें बिना छुए दूसरे को पीटना होता है। जैसा कि आप इस विजुअल में देख रहे हैं।
मुझे कजूएरा करने में मजा आने लगा। यह एक नॉन वाएलेंस मार्शल आर्ट है। इसमें बिना छुए दूसरे को पीटना होता है। जैसा कि आप इस विजुअल में देख रहे हैं।
अनाथालय से 6 बच्चों को सिलेक्ट किया गया। उनमें मैं भी था। हम सभी को कोच अपने एकेडमी में ट्रेनिंग देने लगे। जल्द ही मुझे ग्रीन ब्लेट हासिल हो गया। एक दिन वहां पेरिस से एक टीचर विजिट करने आए। उन्होंने मुझसे कहा कि पेरिस चलोगे? मुझे लगा मजाक कर रहे हैं।
तकरीबन 6 महीने बाद उनका फोन आया कि टिकट भेज रहा हूं, तुम्हें पेरिस आना है। मैं पहली बार हजाई जहाज में बैठा। जिसने मेरा वीजा भेजा था, उनका नाम शिकॉच था। पेरिस जाते ही शिकॉच से पूछा कि उन्होंने मेरे लिए ऐसा क्यों किया? उन्होंने बताया कि उनकी कहानी भी मेरी जैसी ही है। इसलिए वे स्लम एरिया के बच्चों की मदद करते हैं।
शिकॉच ने मुझे कजूएरा की ट्रेनिंग दी। मुझे ब्राजील भी अपने पैसे से भेजा। फिर भारत आकर मैंने खुद कजूएरा सिखाना शुरू कर दिया।
मैं अपने अनाथालय के कजूएरा के कोच के साथ उन्हें असिस्ट करने लगा। धीरे-धीरे मुझे पता लगा कि वे मेरे नाम पर बिजनेस कर रहे हैं। मेरे अनाथ होने की कहानी सुना कर पैसों की उगाही कर रहे हैं। मैंने फौरन उनसे अलग हो गया। अब मेरे पास थोड़े रुपए हो गए थे। मैंने दोबारा कजूएरा की ट्रेनिंग के लिए ब्राजील जाने का प्लान किया। रात-दिन एक करके इसकी ट्रेनिंग ली।
भारत लौटने के बाद स्कूलों में काम मांगने गया। मुझे अमेरिकन स्कूल, बिडला स्कूल, ओबरॉय स्कूल जैसे नामी स्कूल बतौर क्लाइंट मिले। मैंने विकलांग बच्चों और झोपड़पट्टी के बच्चों को कजूएरा सीखाना शुरू किया। फिर अपनी एक कंपनी खोली। आज पूरी दुनिया में कजूएरा सीखने और सिखाने के लिए घूमता हूं।
मैं एक ऐसा प्लान तैयार कर रहा हूं कि कजूएरा को स्कूल करिकुलम का हिस्सा बनाया जा सके, क्योंकि जैसे कजूएरा ने मेरी जिंदगी बदली, मैं चाहता हूं कि यहीं बदलाव मेरे जैसे दूसरे बच्चों में भी दिखे।