घने कोहरे और ठंड से बचने के लिए किसान फसलों की ऐसे करें देखभाल, वरना पैदावार पर पड़ेगा ये असर
Haryana Update, New Delhi: गिरते हुए तापमान से जनजीवन अस्त व्यस्त है. वही फसलों को भी गिरता हुआ तापमान बीमारियों की चपेट में ले रहा है. आलू की फसल में झुलसा पिछेता रोग, टमाटर और मिर्च में लीफ कर्ल वायरस, सरसों में माहू और तुलसिता रोग चपेट में ले रहा है तो गेंहू की फसल में पीला रतुआ रोग लगने के प्रबल संभावनाएं बनी हुई हैं. (सिमरनजीत सिंह/शाहजहांपुर)
शाहजहांपुर में पिछले कई दिनों से तापमान 5 डिग्री से 10 डिग्री बना हुआ है. कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की खेती करने वाले किसानों को विशेष ध्यान देने की सलाह दी है. क्योंकि इन दिनों गेहूं में पीला रतुआ रोग (yellow rust in wheat) लगने की संभावना प्रबल हो जाती हैं.
कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. एनसी त्रिपाठी ने बताया कि पीला रतुआ का प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रोपीकोनाजोल (Propiconazole) 200ml प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर दें. ऐसा करने से पीला रतुआ रोग को रोका जा सकता है.
उत्पादन में भारी गिरावट आती है. यह कीट 24 घंटे में 80 हजार बच्चे पैदा करता है. ऐसे में इसकी तत्काल रोकथाम करना बेहद जरूरी है. रोकथाम के लिए किसानों को 100 ml इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव कर दें.
कृषि विज्ञान केंद्र की पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ नूतन वर्मा ने बताया कि इन दिनों सरसों की फसल को तुलासिता रोग भी चपेट में ले सकता है. तुलासिता रोग के लक्षण यह हैं कि पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले और ठीक उनके नीचे की सतह पर रूई जैसी फफूँद छा जाती है. रोगग्रस्त पौधों की बढवार रूक जाती है. पत्तियाँ समय से पहले झड़ जाती हैं.
इसकी रोकथाम के लिए मैंकोजेब (Mancozeb) 75% 400 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर दें. इसके अलावा अगर सरसों की फसल में तुलासिता रोग के लक्षण ना दिखें तो भी किसान सावधानी के लिए इस दवा का छिड़काव कर सकते हैं.
कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यान वैज्ञानिक डॉ महेश कुमार ने बताया कि मिर्च, बैंगन और टमाटर में लीफ कर्ल वायरस का प्रकोप बढ़ रहा है. इस वायरस से पौधों की पत्तियां मुड़ जाती हैं. एक गुच्छे की तरह इकट्ठी हो जाती है. उसके बाद पूरे पौधे का विकास रुक जाता है. ऐसे में पौधे में फूल और फल नहीं आता है. इस बीमारी से निजात पाने के लिए किसान एमिडा क्लोरप्रिड 10ML प्रति टंकी (करीब 16 लीटर) के हिसाब से छिड़काव कर दें.
तापमान में गिरावट और कोहरे की वजह से आलू की फसल में पिछेता झुलसा रोग आ रहा है. पिछेता झुलसा रोग एक फंगस बीमारी है. जिसमें पत्तियां जल जाती हैं.
आलू के पौधे की पत्तियां झुलस कर भूरे रंग में तब्दील हो जाती है. उसके बाद पूरा खेत में एक काली चादर की तरह दिखने लगता है. उन्होंने कहा है कि पत्तियां जल जाने से प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है.
इससे आलू का साइज कम रह जाता है और उत्पादन कम हो जाता. जिला उद्यान अधिकारी डॉ राघवेंद्र सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि आलू की फसल को पिछेता झुलसा रोग से बचाने के लिए मैन्कोजेब, प्रोपीनेब और क्लोरोथेलोंनील दवा 2.0 से 2.5 किग्रा दवा 1000 ली0 पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव कर दें. जिन खेतों में बीमारी का प्रकोप आ चुका है.
उनमें किसी भी फफूंदनाशक साईमोक्सेनिल और मैन्कोजेब का 3.0 किग्रा प्रति हेक्टेयर या फेनोमिडोन और मैन्कोजब का 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या डाइमेथोमार्फ 1.0 किग्रा और मैन्कोजेब 2.0 किग्रा प्रति हेक्टेयर 1000 ली0 पानी में मिलाकर छिड़काव कर दें.