PM नरेंद्र दामोदरदास मोदी सांस्कृतिक नवाचार के प्रतीक हैं, जानिए कैसे

आज भारतीय संस्कृति और सभ्यता का केंद्र फिर से अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर का निर्माण, केदारनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल का महालोक, चारधाम परियोजना, जम्मू-कश्मीर में मंदिरों का जीर्णोद्धार या 500 साल बाद पावागढ़ के माता मंदिर में ध्वज पताका लहराना है।
 
Haryana Update : 1857 की क्रांति असफल हो गई क्योंकि भारत में जातीय भेदभाव इतना व्यापक था कि सभी को एक मत पर एकत्र करना लगभग असंभव था। 2020 में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्वागत समारोह अहमदाबाद में दुनिया के सबसे बड़े स्टेडियम में हुआ. ऊपर से, अंग्रेज बहुत चालाक हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में अपने पहले भारतीय दौरे पर अहमदाबाद को देखा था. अक्टूबर 2019 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जिनपिंग ने यूनेस्को की वैश्विक धरोहर सूची में शामिल तमिलनाडु के मामाल्लापुरम में मुलाकात की। फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने भारत में मिर्जापुर और वाराणसी भी देखा था। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिस ट्रूडो ने अपने भारत दौरे पर गोल्डन टेंपल में माथा टेका था. उन्होंने अमृतसर भी देखा था। ट्रूडो ने मुंबई और गुजरात के साबरमती आश्रम भी देखा था। 2018 में, साउथ कोरिया की पहली महिला किम जुंग सूक ने अयोध्या में दीपावली मनाई। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने गंगा आरती की तस्वीरें आज भी याद हैं। मोदी-आबे की वाराणसी में हुई मुलाकात काशी-क्योटो संबंधों को लेकर बहुत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से मुलाकात की।

"किसे अपने साथ मिलाना है और किसे निपटाना है"। हर बैठक, चाहे वह राजनीतिक हो या सामाजिक हो, उनके इशारे पर चलती थी। ऐसे में भारत को स्वतंत्रता कैसे मिलेगी? क्योंकि देश को स्वतंत्रता मिलेगी ही जब लोगों में राष्ट्रवाद का भाव पैदा होगा। इससे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पैदा कैसे किया जा सकता है! उस वक्त प्रखर राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत लोकप्रिय था, “गणेश उत्सव” की योजना के साथ आया। मराठा परिवारों में कुलदेवता गणपति को घर में ही पूजा जाता था। तिलक ने इसे एक राष्ट्रीय उत्सव में बदल दिया ताकि सभी लोगों को एक छत्र के नीचे लाकर उनमें एकजुटता का भाव भर दे।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बिना देश एक आत्मा की तरह है। संस्कृति में अपनत्व की भावना, धर्म, भाषा, साहित्य, भोजन, त्योहार, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पर्यटन और बहुत कुछ मिलकर बनती है। भारत बहुत सौभाग्यशाली है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक इतनी विविधता के बावजूद एक ही संस्कार से जुड़े हुए हैं। किसी भी देश का विकास और प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसकी सांस्कृतिक विरासत है। हमारी सभ्यता और संस्कृति का इतिहास हजारों साल पुराना है, इसलिए चाहे कितने ही विवाद हों, हम नहीं टूटते। हम सब भारतीय हैं और हमारी एकजुटता ही हमारे पुनर्निर्माण का सबसे बड़ा कारक है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “एक भारत श्रेष्ठ भारत” के लक्ष्य के साथ पूरे देश को संस्कृति से बाहर निकालने का प्रयास किया है।
भारतीय संस्कृति और सभ्यता के केंद्र फिर से अपना पुराना वैभव पा रहे हैं, चाहे वह अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर का निर्माण हो, केदारनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हो, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो, महाकाल का महालोक हो, चारधाम परियोजना हो या 500 साल बाद पावागढ़ के माता मंदिर में ध्वज पताका लहराना हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर निरंतर भजन पोस्ट किए हैं, जिसे आपने देखा होगा। फिर वह चाहता है कि स्वाति मिश्रा, जुबिन नौटियाल या स्वस्ति मेहुल हों। Modi धर्म और संस्कृति के हर हिस्से को समझते हैं। वास्तव में, नरेंद्र मोदी एक आम आदमी के नेता हैं और राजनीतिक निष्क्रियता से दूर हैं। मोदी ने राजनीति में आने से पहले स्वयंसेवकों और प्रचारकों के रूप में लगभग पूरे भारत का दौरा किया था। इसलिए वे हर राज्य की संस्कृति को जानते हैं और जहां भी जाते हैं, वहां के "कल्चर से तुरंत कनेक्ट" होते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते वर्ष गुवाहाटी के सुरसजई स्टेडियम में दस हजार से अधिक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत रंगारंग बिहू कार्यक्रम को देखा तो कर्नाटक के कुलबर्गी में ढोल बजाया। कुछ निर्णय दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में निर्णायक मंडल ने 2023 में गीता प्रेस, गोरखपुर को सर्वसम्मति से "गांधी शांति पुरस्कार" के लिए चुना था। ये घर-घर सनातन संस्कृति को लाने की कोशिश का सम्मान है। 14 भाषाओं में निरंतर सेवा का भी सम्मान हुआ है। करोड़ों प्रकाशित पुस्तकों का सम्मान हुआ है। गीता के ज्ञान और रामचरितमानस की सेवा का सम्मान हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी संस्कृत और तमिल, भारत की दो सबसे पुरानी भाषाओं को लेकर चिंतित हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कहा कि “भारत का प्राचीन ज्ञान हजारों वर्षों तक संस्कृत भाषा में ही संरक्षित किया गया है। दर्शन, योग और आयुर्वेद जैसे विषयों पर अध्ययन करने वाले लोग अब अधिक संस्कृत सीख रहे हैं। केंद्र सरकार वेद विद्या को बढ़ावा देने के लिए जल्द ही महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के पांच क्षेत्रीय केंद्रों को गुवाहाटी, बद्रीनाथ, ओडिशा, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम में स्थापित करेगी। प्रधानमंत्री ने तमिल भाषा को भी बढ़ावा दिया है। मोदी ने तिरुचिरापल्ली में भारतीदासन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में तमिल में अपना भाषण शुरू किया। प्रधानमंत्री ने पूरे भाषण में अग्रेजी शब्दों के साथ-साथ तमिल भी प्रयोग किया। ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के विचार को संसद में पवित्र सेंगोल की स्थापना हो या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में उनके मार्गदर्शन से चल रहा कार्यक्रम काशी तमिल संगमम्।
G20 की अध्यक्षता के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय संस्कृति की विविधता और वैभव को दुनिया को दिखाने का एक बड़ा अवसर मिला। भारत की सांस्कृतिक विरासत, धर्म, कला और परंपराओं का एक अनूठा संगम है, विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। G20 बैठकों में मोदी सरकार ने पूरी कोशिश की कि अपने अतिथियों को हजारों वर्षों के दौरान विकसित हुई कला, वास्तुकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य, पर्वों और रीति-रिवाजों से परिचित करा सकें। प्रधानमंत्री ने G20 की बैठकों को दिल्ली और मुंबई की सीमा से पूरे भारत में स्थानांतरित करवाया।

संस्कृति कार्य समूह की बैठक वाराणसी में हुई, जबकि व्यापार और निवेश पर बैठक जयपुर में हुई। गांधीनगर में स्वास्थ्य कार्य समूह की बैठक में प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत के कई व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र (जैसे गोवा, हम्पी, गुरुग्राम, पुणे, महाबलीपुरम, खुजराहो, रांची, उदयपुर, हैदराबाद, ऋषिकेश, श्रीनगर, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, सिलीगुड़ी, अमृतसर) ने G20 के मेजबान बनने के अलावा अपनी कला और संस्कृति से विश्व को परिचित करवाया। शिखर सम्मेलन में आने वाले अतिथियों को हमारी कला-संस्कृति से परिचित होने का अच्छा अवसर मिला। राजधानी दिल्ली के एयरपोर्ट से निकलते ही शीर्ष राष्ट्राध्यक्षों को यक्ष-यक्षिणी की नमस्कार मुद्रा में लगी प्रतिमाएं मिलीं. तमिलनाडु के स्वामीमलाई जिले के शिल्पकारों द्वारा बनाई गई भगवान शिव की अष्टधातु मूर्ति भारत मंडपम के गेट के ठीक सामने दिखी। भारत मंडपम् में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्राध्यक्षों का स्वागत किया, जो सबसे दिलचस्प क्षण था। प्रधानमंत्री स्वयं मेहमानों को ओड़िशा के नालंदा विश्वविद्यालय और कोणार्क सूर्य मंदिर की ऐतिहासिक तस्वीरें दिखा रहे थे।
इन अति विशिष्ट व्यक्तियों के दौरे दिल्ली से बाहर ऐसे ही रखे जाते हैं। वर्तमान में भी देश का अतीत सुंदर और प्रभावशाली लगता है, और इसके लिए बहुत प्रयास भी हो रहे हैं। भारत का सांस्कृतिक वैभव एक नया आयाम ले रहा है. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी में बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन में महालोक कॉरिडोर, चारधाम कॉरिडोर, केदारनाथ धाम का पुनर्निर्माण, पवित्र डेरा बाबा नानक-करतारपुर साहिब कॉरिडोर और कोणार्क का सूर्य मंदिर, मदुरई का मीनाक्षी मंदिर, एलोरा का कैलाश मंदिर, मोढेरा सूर्य मं इसके अलावा 15 पर्यटन सर्किट भी बन रहे हैं, जिनमें बौद्ध सर्किट, रामायण सर्किट और तीर्थंकर सर्किट शामिल हैं। पुराने वैभव को फिर से वही स्थान देना आवश्यक है क्योंकि भारतीय सनातन परंपरा धर्मान्तरण के कुचक्र और प्रलोभन से नहीं टूटी थी, न ही शकों हूणों गजनवी, गोरी, तैमूर, औरंगजेब, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे आक्रान्ताओं के कहर से।