Aung San Suu Kyi Birth Annivarsery: कौन है म्यांमार की Iron lady, चुनाव जीतीं फिर भी नही बन पाई राष्ट्रपति

हालाँकि, लोकतंत्र के निराश लोगों ने उन्हें सताने का एक भी मौका नही छोड़ा और लगातार उन पर अत्याचार करते रहे. हम दूसरों के अधिकारों के लिए अपनी जान देने वाली म्यांमार की महिला आंग सान सू की की बात कर रहे हैं. उन्होने दूसरों के अधिकारों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाना शुरु की तब से उनका सफर कठिन हो गया 
 

Aung San Suu Kyi Birth Annivarsery : म्यांमार की लौह महिला ने देशवासियों के अधिकारों के लिए हमेशा आवाज उठाई. 1991 में वह भी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुई, क्योंकि वह हार नहीं मानी और अपना संघर्ष जारी रखा था. 

हालाँकि, लोकतंत्र के निराश लोगों ने उन्हें सताने का एक भी मौका नही छोड़ा और लगातार उन पर अत्याचार करते रहे. हम दूसरों के अधिकारों के लिए अपनी जान देने वाली म्यांमार की महिला आंग सान सू की की बात कर रहे हैं. 

उन्होने दूसरों के अधिकारों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाना शुरु की तब से उनका सफर कठिन हो गया. आंग सान सू फिलहाल जेल में है, लेकिन उनके विचारों के कारण उनकी आलोचना करने वालों से अधिक लोग उनके प्रशंसक हैं.

आंग सान सू की, का जन्म 19 जून, 1945 को रंगून में हुआ था. शुरू से ही उनका परिवार म्यांमार को समर्पित था. इनके पिता ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका का साथ दिया था और आधुनिक बर्मी सेना बनाई थी. 

आंग सान के पिता ने बर्मा की स्वतंत्रता की लगातार मांग की, जिससे उनके दुश्मनों ने उनकी हत्या कर दी. दरअसल, म्यांमार को उस समय बर्मा कहा जाता था. सान के पिता के निधन के समय वह दो साल की थी और मां ने उसकी देखभाल की. 

उनकी मां ने इसके बाद उनका पालन-पोषण किया. आंग सान की मां भी म्यांमार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थी. 1960 में, आंग सान की मां भारत और नेपाल में बर्मा की राजदूत थीं. 

उस समय, आंग सान दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ती थी. 1964 में उन्होंने राजनीति विज्ञान से स्नातक किया और फिर ऑक्सफोर्ड में दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र में पढ़ाई की.

बाद में उन्होंने न्यूयॉर्क में रहकर तीन साल तक यूएस में काम किया. 1972 में, तिब्बती संस्कृति के अध्येता और भूटान में रहने वाले डॉ. माइकल ऐरिस से उन्होंने यहीं शादी कर ली और दो बेटे हुए. 

मानवाधिकारों की आवाज उठाने के बाद आंग सान कुछ सालों बाद अपनी मां की सेवा करने के लिए म्यांमार वापस आई. यहां पर सेना की क्रूरता से वह बहुत परेशान हो गईं और न्याय और अधिकारों के लिए आवाज उठाने की ठनी. 

जब उन्होंने लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का नेतृत्व किया, तो विदेश जाने पर पाबंदी लगा दी गई, जिससे वे अपने पति के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सकीं.

आंग सान को 1991 में उनके संघर्ष के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वे उस समय नजरबंद थीं, इसलिए अवॉर्ड नहीं ले पाईं. दुनिया भर में उन्हें रिहा करने की मांग उठने लगी, जिससे म्यांमार पर दबाव बढ़ा. 

2008 में आंग सान को भी अमेरिका के कांग्रेसनल गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया, जो दिलचस्प है कि वह जेल में रहते हुए पहली व्यक्ति थी जो इस पुरस्कार से सम्मानित हुई. 

2010 में म्यांमार में हुए आम चुनाव ने आंग सान को संवैधानिक तौर पर राष्ट्रपति बनने से रोका, जिसके छह दिन बाद उसे जेल से रिहा कर दिया गया. वह 1991 का नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद 2012 में यूरोप घूम गईं. 

2015 में, 25 साल में पहली बार म्यांमार में हुए राष्ट्रीय चुनाव में, उन्होंने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का नेतृत्व कर जीत हासिल की और विरोधी दल की नेता बन गईं. लेकिन संवैधानिक तौर पर उन्हें राष्ट्रपति नहीं बनाया गया, इसलिए उनकी पार्टी ने सरकार बनाई और वे विदेश मंत्री बनीं.

सरकार में आने के बाद आंग सान सू की ने रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के लिए बदनाम राज्य रखाइन के लिए एक योजना बनाई. रोहिंग्या नागरिकता की मांग कर रहे थे, लेकिन आंग सान ने एक इंटरव्यू में नागरिकता देने से इनकार कर दिया. 

लेकिन उन्होंने कहा कि वह रोहिंग्याओं को परिचय पत्र देने को राजी है. हालाँकि, आंग सान को रोहिंग्या मुद्दे पर पूरी दुनिया ने घेर लिया था. 

2021 में सेना ने तख्तापलट किया: 2020 के चुनाव में उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला, लेकिन सेना ने आंग सान को संसद के पहले दिन ही दूसरे राजनेताओं के साथ कैद कर लिया. 

दिसंबर 2021 में सेना ने उन्हें चुनाव में धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और कोरोना नियमों का उल्लंघन करने के आरोपों में चार साल की सजा सुनाई. जनवरी 2022 में, आंग सान सू की को फिर मामले में सुनवाई करते हुए चार साल की सजा सुनाई गई. 

आंग सान को दिसंबर 2022 तक विभिन्न मामलों में 32 साल की सजा सुनाई गई है.

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