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Shri Krishna Janmasthmi: आसान नहीं रहा जन्मभूमि का सफर, जानिए वजह

Shri Krishna Janmasthmi: Journey to Janmabhoomi has not been easy, know the reason
 
Shri Krishna Janmasthmi: आसान नहीं रहा जन्मभूमि का सफर, जानिए वजह 

Shri Krishna Janmbhoomi: जन्माष्टमी एक ऐसा त्योहार है जो सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है. लेकिन मथुरा की जन्मभूमि की जन्माष्टमी की बात ही कुछ और है.

 

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ही यहीं हुआ था और अब यहां एक भव्य मंदिर बना हुआ है जिसपर कि श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है. बताया जाता है कि करीब 5 हजार साल पहले मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव में राजा कंस का कारागार हुआ करता था. इसी कारागार में भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था. 
 
कठिन रहा मंदिर का सफर

इस कारागर की जगह पर अब मंदिर बना हुआ है. हालांकि श्रीकृष्ण जन्मभूमि का सफर भी कुछ आसान नहीं रहा है. इस भव्य मंदिर के पास में ही एक शाही ईदगाह मस्जिद है. मंदिर और मस्जिद का यह विवाद पुराना रहा है.

 

कोर्ट में इस मामले में केस भी चल रहा है. इतिहासकार इस मंदिर के सफर को कुछ ऐसे बताते हैं कि भगवान कृष्ण का यह मंदिर 3 बार तोड़ा और 4 बार बनाया जा चुका है. गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तरह आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने इस मंदिर पर भी हमला किया था और इसे तोड़ दिया था.

कब-कब बनाया गया और तोड़ा गया मंदिर?

ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने पहली बार यह मंदिर बनवाया था. यहां से मिले शिलालेखों पर ब्राह्मी-लिपि में दर्ज जानकारी के आधार पर बताया जाता है कि शोडास के राजकाल में वसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर एक मंदिर बनवाया था. उन्होंने तोरण द्वार और यज्ञ वेदिका का भी निर्माण कराया था.

Shri Krishna Janmasthmi: आसान नहीं रहा जन्मभूमि का सफर, जानिए वजह 

मंदिर पर कई बार हुए हमले

इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए इस मंदिर पर महमूद गजनवी ने 1017 ईस्वी में आक्रमण किया था और इसे लूट लिया था. विक्रमादित्य ने 400 ईस्वी में यह मंदिर बनवाया था.

यह एक भव्य मंदिर हुआ करता था. फिर 1150 ई. में मथुरा के राजा विजयपाल देव के काल में जनुजा ने फिर से इस मंदिर का निर्माण कराया. लेकिन 16वीं सदी में सिकंदर लोधी ने हमला कर इस कृष्ण जन्मभूमि मंदिर को नष्ट कर दिया. फिर करीब 125 साल बाद ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने चौथी बार इस मंदिर का निर्माण कराया.

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मंदिर की जमीन पर बनाई गई मस्जिद

इसके बाद 1658 में जब औरंगजेब ने मुगल सल्तनत संभाली तब उसके शासनकाल में भी मथुरा पर हमला हुआ. औरंगजेब ने 1669 में मंदिर तुड़वा दिया और एक हिस्से में मस्जिद बनाए जाने का आदेश दिया. 1670 ईस्वी में यह मस्जिद तैयार हुई और फिर उसी साल वहां ईद की नमाज अदा की गई. जिसे आज ईदगाह मस्जिद के नाम से जाना जाता है.

मदन मोहन मालवीय की अंतिम इच्छा

पुराने समय की कुछ रिपोर्ट्स तो कहती हैं कि ब्रिटिश इंडिया में साल 1815 में नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने इस जगह को खरीदा था. 1940 में जब पंडित मदन मोहन मालवीय यहां आए तो श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखकर काफी निराश हुए.

1943 में फिर देश के जाने माने उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा पहुंचे तो वे भी इसकी दशा देख दुखी हुए. इस बीच मालवीय ने बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनरुद्धार को लेकर एक पत्र लिखा. बिड़ला ने भी अपना अनुभव बताया.


साल 1944 में 7 फरवरी कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खरीद लिया. 1946 में मालवीय का देहांत हो चुका था. लेकिन उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की.

जयदयाल डालमिया के साथ मिलकर वे इस जमीन पर मंदिर पर बनाने के इच्छुक थे. 1953 में उद्योगपतियों की सहायता से मंदिर का निर्माण शुरू हुआ और फिर 16 सितंबर 1958 को श्रीकृष्ण केशव देव मंदिर का वर्तमान स्वरूप बनकर तैयार हो पाया.

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